माँ

माँ क्यों है तू ऐसी
आज फिर तेरे बच्चे अचिंतित सोयेंगे
आज फिर तेरे बच्चे खुशी खुशी अपने सपने बोएंगे
उस बड़े से दिल में तकलीफों का बोझा लिए
अपने परिवार एवं बच्चों के सोच में डूबी है
मन की आशंकाओं के उस भवर में भी
शांत एवं खामोश बैठी है ।

माँ क्यों है तू ऐसी
उसी भुरी कुर्सी पर बैठे
दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए
बच्चों के आने के इंतज़ार में
भले ही भूख और प्यास हो जितनी
लेकिन इस ममता की इजाज़त नहीं
एक भी निवाले को लेने की।

माँ क्यों है तू ऐसी
बच्चों की जीत में भी
खुशी से अपने बच्चों को केवल निहार रही है
दिल तो खुशी से कह रहा होगा तेरा भी
"बेटी तेरी इसी जीत में तेरी माँ की जीत है"
लेकिन फिर डरती है उसकी ममता एक अनजाने डर से
कि कहीं उसके बच्चों की खुशियों को नज़र ना लग जाए
यूं तो सबको ज्ञात है नज़र नहीं लगती माँ की
पर माँ के उस भोले मन को कोन समझाए
जो हर वक्त बच्चों की चिंता में डूबी रहती
क्या पता उनके साथ कोई अनहोनी ना हो जाए ।

माँ क्यों है तू ऐसी
बेचैन मन में कई कहानियां समाई है तेरी
फिर भी शांत और खामोश है
क्यों नहीं जताती अपनी खुशियों को
शायद इसीलिए तू माँ है
और दुःख और पीड़ा की यही बात है
कि सुनने को तेरी ये सब बातें
सामने की बस एक दीवार है।


आज मदर्स डे है। कई लोग काफ़ी कुछ अच्छा लिख रहे हैं। अपनी माँ पर और दुनिया की हर उस माँ पर जिसने अपने बच्चों और अपने परिवार के सामने अपनी निज़ी ज़िन्दगी को कभी एहमियत नहीं दी। मैंने भी एक छोटी सी कोशिश की; माँ की ज़िन्दगी के कुछ अनछुए पहलुओं को आंकने की, विभिन्न परिस्थितियों को झेलते हुए उसके उलझन और कश्मकश को दर्शाने की। ये केवल किसी एक माँ के ऊपर लिखी कविता नहीं है, बल्कि विभिन्न परिवारों की विभिन्न स्थितियों में माँ की कहानी है एवं ख़ुशी और दुःख सभी क्षणों में माँ की प्रतिक्रियाओं के चित्रण की एक छोटी सी कोशिश है। सीधे शब्दों में यूँ कहिये - "A different perspective on the lives of mothers" है।






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